सावित्री व्रत की करूं में पूजा।
सुहाग बिन कुछ न मांगू दूजा।।
महा सती देवी सावित्री माता।
अखंड सुहाग सौभाग्य दाता।।
अखंड सुहाग का वर देना हे सती।
तेरी कृपा से रहूं सदा सौभाग्यवती।।
सदा सलामत रहे माथे की लाली।
हर साल सजाऊं पूजा की थाली।।
अटूट रहे मेरी कांच की चूड़ियां ।
शोभा बनी रहे माथे की बिंदिया।।
संजोए रहे सदा माला की मोती।
दमकते रहे सिंगार की ज्योति।।
तेरी चरणों में मा करूं में वंदन।
सलामत रहे सदा ये प्यार का बंधन।।
यही मेरी पूंजी संपत्ति धन है।
रक्षा करना इसकी निवेदन है।।
कंचन की भले न हो भाग्य ।
कांच के साथ सदा रहे सौभाग्य।।
सुहाग सतीत्व की रक्षा करना।
सुहाग पे आए हर संकट हरना।।
हर सांस भरूं में बन के सुहागन।
अर्थी में जाऊं बन के में दुल्हन।।
न जानू पूजा क्षमा करना माता।
सौभाग्य अखंड रहे भाग्य विधाता।।





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