धन्य हो जाए धरा (प्रणति साहू, प्रोफेसर कालोनी, रायपुर)

 


धन्य हो जाए धरा जब बरसे है सावन।

पुलकित हो लहराए ये मदहोस पवन।।

गिरे जब बूंदे जैसे लगे सीप की मोती।

चमके बिजुरिया अंबर में जैसे दीपक ज्योति।।

ठिठुरते लबों के भांति पत्ते पत्ते कांपते।

कहीं कlकज की कस्तियां तैरते दिखाई देते।।

बारिश की बूंदों को तरसती हर एक जीवन है।

नवजीवन का संचार का ये नया पैगाम है।।

धूल ग्रसित ये आसमा उजला उजला लगता है।

मिट्टी की सोंधी खुशबू से आत्मा महक सा जाता है।।

हरी साड़ी पहने धरती मन मोहक वो रूप है।

आंख मिचोली खेले जैसे बादल के संग धूप है।।

क्या नजारा लगता है आ जाए जो सावन है।।

गरजे बlदल बरसे सावन झूमे नाचे तन मन है।।

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