जागो उठो ऐ भारतबासी, (रचनाकार प्रणति साहू, प्रोफेसर कालोनी, रायपुर)

 



जागो उठो ऐ  भारत वासी आया युग ये योग का ।

थोड़ा तो तुम समय निकालो जीवन है जो भोग का ।।

त्राहि त्राहि दुनियां करती रोग का है राज यहां ।

एक बार योग पथ पे अlजा जीवन का है सlज जहां ।।

नीत भोर से अlये गुरुवर गाने योग के गीत नया ।

जो जागे वो पाए साथी फिर तू कैसे सोया रहा ।।

स्वाथ्य ही संपद होता प्यारे हीरे मोती पड़ते फीके ।

जरा ब्याधी से मुक्त होजाए गर नीत उठ कर योग सीखे ।।

 हाय हाय कर कटता जीवन काम न आए दौलत धन ।

योग के पथ पर चलकर देख सफल हो जाएगा जीवन ।।

काम न आते पति पुत्र बंधु सखा सहोदर भी ।

अगर जीवन को घिरते रहते सदा ही जिसके रोग ब्याधि ।।

पत्नी प्रेमी प्रेम भी धुंधला दिखता है जब रोग सताए ।

धन कमा के मन न भरता फिर तू काहे रोग कमाए ।।

समय रहते तू जाग जा प्यारे काहे अपना समय गंवाए ।

योग है वो संदूक जिसमे स्वास्थ्य का धन समाए ।।

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