सुबह(प्रणति साहू, प्रोफेसर कालोनी, रायपुर)

 


सुबह लगे कितनी प्यारी गlए कोयल गीत ,

खिलती कलियां ढूंढे भंवरे जैसे मन के मित ।

सूरज चमके लालिमा जैसे माथे टीका ,

सोभा इतना बढ़े धरा की स्वर्ग भी लगे फीका ।

हरी साड़ी पहने धरती लगती जैसे दुल्हन ,

मन को मोह लेता है मंद मंद बहता पवन ।

नीले नीले गगन में तैरते हुए बादल ,

छुपन छुपाई खेले जैसे कोमल बालक चंचल ।

पहाड़ों को चीर के बहता झरना पानी ,

कहीं सुंदर झील किनारे नाचते दिखे मोरनी ।

इतनी सुंदर रचना देख भावुक कवि का मन ,

अश्रु भरी पलकों से भीगे कवि नयन ।

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